आजकल काम किसी के पास नहीं है जो था वह करोना की भेंट चढ़ा दिया। जैसे भगवान के भोग लगाते समय किया जाता हैष जो कुछ है सब पूजा में रख दिया । सब करोना ने खा लिया। अब भगवान की ओर आंखे फाड़ कर लखाने लगे है।
राजनेता लोग भी बेरोजगार हो गये, वे करोना के जमाने के डाकू मलखान सिंह व गब्बर सिहं बन गये हैं उन्हीं की तरज पर मुंह पर कपड़ा लपेट दूसरे राजनेतासे गद्दी लुटने का पुरा महा भारत के चक्करव्यूह की रचना कर, दिन दहाड़े लूटते रहते हैं।
है तो कईराज्यों में लेकिन राजस्थान की घटना ताजा और सरकार गिराने का धंधा करने वालों का सटीक उदाहरण है। पजामें से पैर बाहर होते ही सरकार गिराने चल पड़ते हैं। पहले चलना तो सिखना चाहिये, कही घुटनों के बल न चलना पड़े।
आजकल भाग-दौड़ की जिन्दगी में अपने आप को मनुष्य भुल गया है कि वह भी मनुष्य है वह एक मशीन से ज्यादा काम करता है। मशीन की जिंदगी तो बहुत आराम दायक है उसकी देखभाल करने वालों की संख्या बहुत है एक को ढूंढोगे के तो हजार मिलेंगे। बहुत आराम करती है मशीन। जब तक आप उसको काम करने को नहीं कहोगे तो वह कार्य नहीं करेगी। मशीन को काम का आदेश देने के लिए, हमें कम से कम 2 घंटे पहले उठना पड़ता है और एक घंटे बाद तक काम अधिक करना पड़ता है। है न मशीन की मौज। मशीन की गारंटी व वारंटी भी मिलती है। मशीन के डाक्टर जब तक नहीं पहुंच जाये तब तक वह आराम फरमाती है। मशीन की तुलना में मनुष्य की न तो गारंटी है ना ही वारंटी है। मशीन की तकलीफ़ तक मनुष्य की हालत बिगाड़ देती है। मशीन के डाक्टर यानि मकैनिक का चलकर आना पड़ता है जबकि मनुष्य को डाक्टर के पास चलकर जाना पड़ता है। मशीन को नम्बर नहीं लगाना पड़ता है। मनुष्य को कयी बार लाइन में खड़े रहने के बाद तकलीफ समेत वापस आना पड़ता है। मशीन अधिकतर मामलों में एक बार में स्वस्थ हो जाती है जबकि मनुष्य को बहुत बार डाक्टर के चक्कर लगाने पड़ते हैं मनुष्य की इस तरीके से तकलीफ...
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