https://link.amazon/B0esBFH66 आजकल औरतों की एक आम बन चुकी समस्या, जो एक उग्र रोग का रुप धारण कर चुकी है। समस्या आरंभ काल में नगण्य थी। कालांतर में एक विशेष व्याधि बन गई। जिसके इतिहास में महाभयंकर परिणाम भोगने पड़ते, मनुष्य जाति को।
यदि इतिहास में जा कर देखा जाये तो बहुत ही रोचक व अज्ञानता, वैमनस्य, कामना और प्रताड़ना का प्रतिरूप इस बिमारी के उपहार स्वरूप मानवता के कर्म उनकी झोली में वेदनाओं की गाथा लिख रहे हैं। यदि शारीरिक कमजोरी को छोड़कर देखा जाए तो इसका महत्त्वपूर्ण कारण ज्योतिष में छिपा बैठा है।
साफ़ साफ़ शब्दों में उल्लेख किया जाये तो बच्चों की कुण्डली दोष मिलान , एक विशेष जिम्मेदार पहलू हैं। यदि कुंडली मिलान गलत कर दिया। दोनों की योनि एक नहीं हुई तो यह व्याधि यहां भयंकर परिणाम भोगने पर मजबूर कर देती है। दूसरा दोष गण दोष , यदि ये दो दोष विवाहित जोड़े में हैं तो यह बिमारी शत-प्रतिशत औरत व पुरुष को मिलेगी। पुरुष की बिमारी का नाम अलग है कारण रुप एक से है।
काम जनित असन्तोषजनक व्यवहार कुंडलियों का सही मिलान न होना। जिसमें दोनों का हर प्रकार मनमुटाव गलत योनि मिलान है। मैं एक उदाहरण देकर समझाता हूं। यदि एक कव्वे का विवाह गधी के साथ कर दिया गया हो तो क्या वे दोनों आपसी तालमेल बैठा सकेंगे क्या?
उत्तर बिल्कुल साफ है नहीं। इसी कारण आजकल हर गली व नुक्कड़ पर मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा व चर्च और भयानक परिदृश्य विभिन्न प्रकार के आश्रम जिनमें गलत विवाह के परिणाम की झांकियां आये दिन अखबारों की सुर्खियां बनती हैं। असंतोष के साधाक का घिनोना नाम गुरु है। जितने आश्रम आज चल व उत्पन्न हो रहे हैं कारण शरीर व रुपए है । भोग की प्रताड़ना का नंगा नाच का नाम आश्रम है।
इसका दूसरा कारण बेटी यानि लड़की को बोझ व खर्च समझना। लोग केवल अपना बोझ बिना सोचे समझे दूसरे पर जितनी जल्दी हो फैंक दो। ब्याह तो केवल पच्चीस प्रतिशत ही होते हैं। बाकी लड़कियां फैंकी जाती है। बांबे व पुजारी उन्हीं फैंक के सहारे करोड़ पति बने आलिशान गाड़ियां में ग्राहक की तलाश में यह योग फैलाने कार्य करते हैं।
यहां अन्य कारण नगण्य हो ये है। जैसे शारीरिक कमजोरी, हार्मोन का सही निर्माण न होना, स्वच्छता आदि।, यदि बेमेल विवाह है तो केवल योग मानसिक रूप से शरीर को निष्काम कर सकता है। अन्य को दवा दारू से स्वस्थ किया जा सकता है।
यहां एक होमियोपैथी दवा का उपयोग लिख रहा हूं। कहें अनुसार लेना। तब ही आराम होगा। क्योंकि ये दवा ऐलोपैथिक दवाओं की भांति अधिक मात्रा में नहीं लेनी होती है। ये दवाएं शरीर में उत्पन्न क्रियान्वयन के अनुसार निर्मित की जाती है। यदि परहेज व सावधानी नहीं बरती तो उनका असर समाप्त हो जाता है। अधिक मात्रा में लेने से रोग को और व्यग्र रुप में ले आती है।
दोनों पैथियों का फर्क है होमियोपैथी लाइलाज को जड़ से उखाड़ फेंकती है। ऐलोपैथिक में बहुत ही ज्यादा व्याधियों में पूरी उम्र ही नहीं,अगले जन्म में भी दवा व उपकरणों के साथ जीवन जीना पड़ता है व अधिक मात्रा में प्रयोग की जाती है। हां ऐलोपैथिक की खासियत उसके उपकरणों की बदौलत चार चांद लगे हुए हैं। होमियोपैथी में दवा माइक्रो पद्धति यानी अति सूक्ष्म मात्रा में दी जाती है। इसमें इलाज मरीज की बातों के आधार पर किया जाता है ।हर राज कुरेद कुरेद कर पुछा जाता है। ताकि व्याधि का सही निर्धारण किया जा सके।
यदि मरीज कोई बात छुपाता है तो सही दवा नहीं दी जा सकती। इसलिए उसका असर कम होता है या नहीं होता है। होमियोपैथी दवा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि कुछ ही सैंकड में दर्द गायब हो जाता है।
ग्रेफाइट 30 दवा को लिकोरिया/श्वेत प्रदर में दो बूंद आधा कप पानी में मिलाकर सुबह-शाम खाली पेट व रात को सोने के समय ले। जैसे सफ़ेद पानी आना बन्द हो जाये या कम हो जाये तो एक बूंद कर दे। व एक समय। बिल्कुल बंद होने की अवस्था में सप्ताह में एक बार बुस्टर डोज ले। दुसरी एक माह बाद व तीसरी छ महीने बाद में। यदि कभी यह व्याधि आपके पास न फटके तो वर्ष में एक रोग प्रतिरोधक खुराक ले।
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